परंतु यह कि उपखंड (i) से उपखंड (vii) में विनिर्दिष्ट उपर्युक्त सभी या किसी बात को ध्यान में रखते हुए, भिन्न-भिन्न विमानपत्तनों के लिए भिन्न-भिन्न टैरिफ संरचनाएं नियत की जा सकेगी;
अधिनियम की धारा 13(2) के अनुसार प्राधिकरण, पांच वर्ष में एक बार टैरिफ का अवधारण करेगा और इस प्रकार अवधारित टैरिफ का यदि ऐसा करना समुचित और लोकहित में समझा जाए तो उक्त पांच वर्ष की अवधि के दौरान समय- समय पर, संशोधन कर सकेगा।
अध्यक्ष और सदस्य: प्राधिकरण, अध्यक्ष और दो ऐसे अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे। परंतु जब भी प्राधिकरण किसी रक्षा वायु क्षेत्र में सिविल अत: क्षेत्र से संबंधित विषय का विनिश्चिय कर रहा हो तो उसमें रक्षा मंत्रालय द्वारा नामनिर्देशित किया जाने वाला भारत सरकार के अपर सचिव से अन्यून की पंक्ति का एक अतिरिक्त सदस्य उसमें होगा। {धारा 4(1)}
सचिव और अन्य अधिकारी: केन्द्रीय सरकार, एक सचिव को इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के निर्वहन के लिए नियुक्त कर सकेगी। प्राधिकरण, ऐसे अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा जो वह अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षतापूर्वक निर्वहन के लिए आवश्यक समझे। प्राधिकरण, विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट प्रक्रिया के अनुसार उतनी संख्या में सत्यनिष्ठा और उत्कृष्ट योग्यता वाले ऐसे विशेषज्ञों और वृत्तिकों को, जिनके पास अर्थशास्त्र, विधि, कारबार या विमानन से संबंधित ऐसी अन्य विद्या शाखाओं में विशेष ज्ञान और अनुभव है जो इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण को उसके कृत्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए आवश्यक समझे जाएं, नियुक्त कर सकेगा। {धारा 9(1),(2) और (4)}
प्रयोक्ता विकास शुल्क भारतीय वायुयान नियमावली, 1937 के नियम 89 के अंतर्गत लगाया जाता है। प्रयोक्ता विकास शुल्क पारंपरिक रूप से हवाई अड्डे पर सेवाएं मुहैया कराने के लिए किए गए निवेशों पर हवाई अड्डा प्रचालकों के लिए उचित प्रतिलाभ सुनिश्चित करने के लिए लगाया जाता है। दूसरे शब्दों में राजस्व की किसी कमी को पूरा करने के लिए यूडीएफ लगाया जाता है ताकि निवेश पर उचित प्रतिलाभ सुनिश्चित हो सके।
भारतीय वायुयान नियमावली, 1937 के नियम 86, 88 और 89 के संदर्भ में महाविमानपत्तनों पर लगाए/ उद्गृहित किए जाने वाले टैरिफ प्रभार यात्री सेवा शुल्क और प्रयोक्ता विकास शुल्क की दरें ऐरा द्वारा निर्धारित किए अनुसार होंगी।
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